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कालिंजर पहाड़ी को राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल घोषित

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हाल ही में Geological Survey of India ने उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित Kalinjar Fort के आसपास की पहाड़ी को राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल (National Geo-Heritage Site) घोषित किया है। यह निर्णय भारत की भू-वैज्ञानिक विरासत के संरक्षण और उसके वैज्ञानिक महत्व को रेखांकित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल क्या होता है?

  • राष्ट्रीय भू-विरासत स्थल वे क्षेत्र होते हैं जिनमें विशिष्ट भू-वैज्ञानिक संरचनाएँ, चट्टानी क्रम (rock sequences) या पृथ्वी के विकास से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य मौजूद होते हैं।
  • इन स्थलों का संरक्षण वैज्ञानिक अध्ययन, शिक्षा और सतत पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाता है।

कालिंजर क्षेत्र का भौगोलिक महत्व

  • कालिंजर किला विंध्य पर्वतमाला में एक पृथक पहाड़ी पर स्थित है और यह क्षेत्र अपनी प्राचीन चट्टानी संरचनाओं के लिए जाना जाता है।
  • यह क्षेत्र पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास के महत्वपूर्ण चरणों को प्रदर्शित करता है और इसे प्राकृतिक प्रयोगशाला के रूप में देखा जाता है।

प्रमुख भू-वैज्ञानिक विशेषता: एपार्कियन अनकॉन्फ़ॉर्मिटी

  • कालिंजर क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता Eparchaean Unconformity है, जो पृथ्वी के भू-वैज्ञानिक इतिहास में एक बड़े समयांतराल (gap) को दर्शाती है।
    • यहाँ लगभग 2.5 अरब वर्ष पुरानी बुंदेलखंड ग्रेनाइट पाई जाती है।
    • इसके ऊपर 1.2 अरब वर्ष पुरानी कैमूर बलुआ पत्थर (sandstone) स्थित है।
  • यह संरचना पृथ्वी के विकास के अलग-अलग कालखंडों को एक ही स्थान पर प्रदर्शित करती है, जो इसे वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

  • कालिंजर किला भारत के प्राचीन और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण किलों में से एक रहा है।इसका इतिहास लगभग 1500 वर्षों से अधिक पुराना माना जाता है।
    • यह Chandela dynasty के शासनकाल में एक प्रमुख केंद्र रहा।
    • यहाँ स्थित नीलकंठ मंदिर धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
  • यह क्षेत्र प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत के अद्वितीय समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

इस घोषणा का महत्व

  • भू-वैज्ञानिक संरक्षण : इस मान्यता से क्षेत्र की अद्वितीय चट्टानी संरचनाओं का संरक्षण सुनिश्चित होगा।
  • पर्यटन को बढ़ावा : कालिंजर को खजुराहो और चित्रकूट जैसे स्थलों के साथ जोड़कर पर्यटन सर्किट विकसित किया जा सकता है।
  • शोध और शिक्षा : यह स्थल भू-विज्ञान, इतिहास और पुरातत्व के छात्रों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा
  • स्थानीय अर्थव्यवस्था : पर्यटन और संबंधित गतिविधियों से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।

निष्कर्ष