असम विधानसभा ने वर्ष 2026 में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code – UCC) विधेयक पारित कर दिया है।
इसके साथ ही असम, उत्तराखंड और गुजरात के बाद UCC लागू करने वाला भारत का तीसरा राज्य बन गया है।
यह विधेयक विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना तथा लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करता है।
UCC क्या है?
समान नागरिक संहिता (UCC) का तात्पर्य ऐसी व्यवस्था से है, जिसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना तथा अन्य व्यक्तिगत मामलों में धर्म आधारित अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) के स्थान पर सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू किया जाता है। इसका उद्देश्य नागरिकों के बीच कानूनी समानता स्थापित करना है।
UCC का संवैधानिक आधार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को देशभर में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है।
अनुच्छेद 44, राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy – DPSP) का हिस्सा है। यद्यपि यह न्यायालय में बाध्यकारी नहीं है, फिर भी शासन के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत माना जाता है।
भारत में UCC की स्थिति
गोवा में पुर्तगाली सिविल कोड, 1867 के माध्यम से लंबे समय से समान नागरिक कानून लागू है, इसलिए इसे UCC का मॉडल राज्य माना जाता है।
उत्तराखंड वर्ष 2024 में स्वतंत्रता के बाद UCC लागू करने वाला पहला राज्य बना।
इसके बाद गुजरात ने UCC लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए और अब असम वर्ष 2026 में UCC विधेयक पारित करने वाला तीसरा राज्य बन गया है।
असम UCC विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधान
असम UCC विधेयक, 2026 में बहुविवाह और द्विविवाह पर प्रतिबंध का प्रावधान किया गया है। विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य बनाया गया है।
विवाह की न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष तथा महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है। लिव-इन संबंधों के पंजीकरण की व्यवस्था की गई है तथा ऐसे संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध दर्जा प्रदान किया गया है।
इसके अतिरिक्त पति-पत्नी, बच्चों और माता-पिता को समान उत्तराधिकार अधिकार देने का प्रावधान किया गया है। बाल विवाह, धोखाधड़ी अथवा दबाव में कराए गए विवाहों के लिए दंड का भी प्रावधान किया गया है।
हालाँकि, अनुसूचित जनजातियों (STs) को इस विधेयक के दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि उनकी विशिष्ट सामाजिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा की जा सके।
UCC के पक्ष में तर्क
UCC के समर्थकों का मानना है कि इससे सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित होगी। महिलाओं को अधिक समान अधिकार प्राप्त होंगे और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सरलता आएगी।
इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय एकता तथा धर्मनिरपेक्षता को मजबूती मिलेगी और व्यक्तिगत कानूनों के दुरुपयोग की संभावना कम होगी।
UCC के विरोध में तर्क
UCC के आलोचकों का तर्क है कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। वे मानते हैं कि भारत की सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विविधता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
कुछ अल्पसंख्यक समुदायों को यह आशंका भी है कि इससे बहुसंख्यक संस्कृति का प्रभाव बढ़ सकता है।
महत्वपूर्ण सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न मामलों में UCC की आवश्यकता पर टिप्पणी की है।
शाह बानो बनाम भारत संघ (1985) तथा सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995) जैसे मामलों में न्यायालय ने समान नागरिक संहिता के महत्व को रेखांकित किया था।