भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। स्वतंत्रता के बाद से हमारी संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था ने अनेक राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के बावजूद अपनी निरंतरता बनाए रखी है। नियमित चुनाव, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र की बड़ी उपलब्धियाँ हैं। लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। उसकी वास्तविक सफलता इस बात में है कि जनता की राजनीतिक इच्छा संसद और विधानसभाओं में कितनी सही, व्यापक और न्यायपूर्ण रूप से प्रतिबिंबित होती है।
समय के साथ हमारी चुनाव प्रणाली की कुछ सीमाएँ स्पष्ट हुई हैं। एक ओर ऐसा उम्मीदवार निर्वाचित हो सकता है जिसे निर्वाचन क्षेत्र के बहुत कम प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिला हो, तो दूसरी ओर चुनाव के बाद निर्वाचित प्रतिनिधि दल बदलकर उस राजनीतिक जनादेश की प्रकृति ही बदल सकता है जिसके आधार पर जनता ने उसे चुना था। इसलिए अब चुनाव सुधार पर केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मूलभूत लोकतांत्रिक दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है।
इस दिशा में दो बड़े सुधार विशेष रूप से आवश्यक हैं—पहला, वर्तमान दल-बदल विरोधी कानून को समाप्त कर ऐसी व्यवस्था लागू करना जिसमें दल बदलने वाले निर्वाचित प्रतिनिधि को अपनी सदस्यता छोड़कर पुनः जनता के सामने जाना पड़े; और दूसरा, लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति (Single Transferable Vote- STV) को अपनाना।
दल बदलना है तो पुनः जनता के सामने जाइए
भारतीय राजनीति में निर्वाचित प्रतिनिधियों के दल-बदल की समस्या पुरानी है। इसी समस्या को नियंत्रित करने के लिए 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के माध्यम से दल-बदल विरोधी कानून बनाया गया। इसका उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों की राजनीतिक खरीद-फरोख्त और अवसरवादी दल-बदल को रोकना था। उद्देश्य उचित था, लेकिन वर्तमान व्यवस्था ने एक दूसरी समस्या को जन्म दिया है।
लोकतंत्र में किसी सांसद या विधायक को अपनी राजनीतिक राय रखने और अपने दल की नीतियों से असहमति व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए। यदि किसी प्रतिनिधि को लगता है कि उसका राजनीतिक दल अपने मूल सिद्धांतों से भटक गया है, तो उसे उस दल को छोड़ने की स्वतंत्रता भी होनी चाहिए। किसी व्यक्ति को कानून के माध्यम से उसकी राजनीतिक विचारधारा से बाँधकर रखना लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल नहीं है।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है—क्या उसे जनता से मिले पुराने जनादेश के आधार पर दूसरे दल के साथ अपनी सीट बनाए रखने का अधिकार होना चाहिए? – इसका उत्तर नहीं होना चाहिए।
किसी उम्मीदवार को वोट देते समय मतदाता केवल उस व्यक्ति को नहीं देखते। उसके राजनीतिक दल, चुनाव चिह्न, घोषणापत्र, नेतृत्व और विचारधारा का भी मतदाता के निर्णय पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए चुनाव जीतने के बाद यदि प्रतिनिधि अपना दल बदलता है, तो यह मान लेना उचित नहीं कि जिन मतदाताओं ने उसे पहले चुना था वे उसकी नई राजनीतिक निष्ठा का भी समर्थन करते हैं।
इसलिए व्यवस्था बहुत सरल होनी चाहिए—जिसे दल बदलना है, वह स्वतंत्र रूप से दल बदले; लेकिन पहले सांसद या विधायक पद से इस्तीफा दे और फिर नए दल अथवा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जनता के सामने जाए।
यदि जनता उसके निर्णय से सहमत है तो उसे दोबारा चुन लेगी। यदि जनता सहमत नहीं है तो किसी दूसरे उम्मीदवार को चुनेगी। अर्थात- “दल बदलने की स्वतंत्रता प्रतिनिधि की है, लेकिन जनादेश बदलने का अधिकार केवल जनता का है।”
इससे प्रतिनिधि की राजनीतिक स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहेगी और मतदाता के जनादेश का सम्मान भी होगा। साथ ही सत्ता, पद या व्यक्तिगत लाभ के लिए होने वाले अवसरवादी दल-बदल पर भी प्रभावी नियंत्रण लगेगा, क्योंकि दल बदलने वाले व्यक्ति को पता होगा कि अंतिम निर्णय किसी विधानसभा अध्यक्ष, राजनीतिक दल या न्यायालय के बजाय पुनः जनता के सामने होना है।
वर्तमान चुनाव प्रणाली की प्रतिनिधित्व संबंधी समस्या
भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनाव मुख्यतः First-Past-the-Post (FPTP) पद्धति से होते हैं। इसमें सबसे अधिक मत पाने वाला उम्मीदवार विजयी घोषित होता है। उसे कुल मतों के 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करना आवश्यक नहीं है।
इसे एक अधिक व्यावहारिक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में 10 लाख पंजीकृत मतदाता हैं। इनमें से 7.5 लाख वैध मत विभिन्न उम्मीदवारों को प्राप्त होते हैं। चार प्रमुख उम्मीदवारों को क्रमशः इस प्रकार मत मिले—
प्रथम उम्मीदवार — 2.20 लाख मत (29.33%)
द्वितीय उम्मीदवार — 2.10 लाख मत (28.00%)
तृतीय उम्मीदवार — 2.00 लाख मत (26.67%)
चतुर्थ उम्मीदवार — 1.20 लाख मत (16.00%)
इस प्रकार कुल 7.50 लाख वैध मत पड़े।
वर्तमान FPTP व्यवस्था में 2.20 लाख मत प्राप्त करने वाला प्रथम उम्मीदवार विजयी घोषित होगा, क्योंकि उसे अन्य प्रत्येक उम्मीदवार से अधिक मत प्राप्त हुए हैं। लेकिन इस परिणाम को व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से देखें तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है। विजयी उम्मीदवार को कुल 7.5 लाख वैध मतों में से केवल 29.33 प्रतिशत मत मिले। इसका अर्थ है कि 70.67 प्रतिशत वैध मत किसी अन्य उम्मीदवार के पक्ष में पड़े। और यदि निर्वाचन क्षेत्र के सभी 10 लाख पंजीकृत मतदाताओं के संदर्भ में देखा जाए, तो विजयी उम्मीदवार को केवल 22 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं का प्रत्यक्ष मत प्राप्त हुआ। फिर भी वही उम्मीदवार पूरे निर्वाचन क्षेत्र का एकमात्र सांसद बन जाएगा।
यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि निर्वाचित होने के बाद वह संवैधानिक रूप से केवल 22 प्रतिशत मतदाताओं का प्रतिनिधि नहीं होता। वह पूरे निर्वाचन क्षेत्र का सांसद होता है। प्रश्न उसकी संवैधानिक स्थिति का नहीं, बल्कि उस प्रत्यक्ष चुनावी समर्थन की व्यापकता का है जिसके आधार पर वह निर्वाचित हुआ।
5.30 लाख मतों की पहली पसंद प्रतिनिधित्व में क्यों नहीं पहुँची?
उपरोक्त उदाहरण का दूसरा पक्ष और अधिक विचारणीय है।
द्वितीय उम्मीदवार को 2.10 लाख, तृतीय उम्मीदवार को 2 लाख और चतुर्थ उम्मीदवार को 1.20 लाख मत मिले। इन तीनों उम्मीदवारों को कुल मिलाकर 5.30 लाख मत प्राप्त हुए। अर्थात कुल 7.5 लाख वैध मतों में से लगभग 70.67 प्रतिशत मत ऐसे उम्मीदवारों के पक्ष में पड़े जो निर्वाचित नहीं हुए।
इन 5.30 लाख मतदाताओं ने भी उसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लिया। वे मतदान केंद्र पहुँचे, उन्होंने अपनी राजनीतिक पसंद व्यक्त की और उनके मत का संवैधानिक मूल्य भी विजयी उम्मीदवार को दिए गए मत के बराबर था। लेकिन उनकी पहली पसंद किसी प्रतिनिधि को निर्वाचित कराने में सफल नहीं हुई।
इसी स्थिति से एक बुनियादी लोकतांत्रिक प्रश्न पैदा होता है – क्या लोकतंत्र का उद्देश्य केवल यह तय करना होना चाहिए कि कौन उम्मीदवार बाकी उम्मीदवारों से थोड़ा आगे रहा, या यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जनता की अधिकतम संभव राजनीतिक पसंद संसद और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व प्राप्त करे?
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है – “सबसे अधिक मत प्राप्त करना” और “बहुमत का समर्थन प्राप्त करना” एक ही बात नहीं है।
उपरोक्त उदाहरण में विजेता सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार है, लेकिन उसके पास बहुमत का समर्थन नहीं है।
समस्या तब और बड़ी हो जाती है जब यही स्थिति अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में होती है। किसी राजनीतिक दल को पूरे राज्य या देश में बड़ी संख्या में मत प्राप्त होने के बावजूद अपेक्षाकृत कम सीटें मिल सकती हैं, जबकि किसी दूसरे दल को सीमित मत प्रतिशत के बावजूद सीटों का बहुत बड़ा हिस्सा प्राप्त हो सकता है।
इससे “वोट प्रतिशत” और “सीट प्रतिशत” के बीच बड़ा अंतर उत्पन्न हो सकता है।
लोकतंत्र में इसलिए यह विचार आवश्यक है कि नागरिक का मत केवल मतपेटी या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में दर्ज होकर समाप्त न हो, बल्कि यथासंभव वास्तविक प्रतिनिधित्व में परिवर्तित हो।
समाधान: आनुपातिक एकल संक्रमणीय मत पद्धति
भारत को अब लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति (Proportional Representation by means of the Single Transferable Vote—STV) पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श शुरू करना चाहिए।
इस व्यवस्था में मतदाता केवल एक उम्मीदवार को वोट देने तक सीमित नहीं रहता। वह उम्मीदवारों को अपनी पसंद के क्रम में प्राथमिकता दे सकता है—
1 — पहली पसंद
2 — दूसरी पसंद
3 — तीसरी पसंद
4 — चौथी पसंद
मतदाता की पहली पसंद सर्वोच्च होती है। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर निर्धारित नियमों के अनुसार उसका मत अगली प्राथमिकता की ओर स्थानांतरित हो सकता है।
यदि कोई उम्मीदवार निर्वाचित होने के लिए निर्धारित आवश्यक मत-सीमा या कोटा प्राप्त कर लेता है और उसके पास उससे अधिक मत होते हैं, तो निर्धारित पद्धति के अनुसार उसके अतिरिक्त मत मतदाताओं की अगली प्राथमिकताओं की ओर स्थानांतरित किए जा सकते हैं।
इसी प्रकार यदि कोई उम्मीदवार सबसे कम मतों के कारण प्रतिस्पर्धा से बाहर होता है, तो उसके मत केवल समाप्त नहीं हो जाते; जहाँ संभव हो, वे उन मतपत्रों पर अंकित अगली उपलब्ध प्राथमिकता के अनुसार दूसरे उम्मीदवारों को स्थानांतरित किए जाते हैं।
इसी कारण इसे “एकल संक्रमणीय मत” कहा जाता है।
इस व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि मतदाता की राजनीतिक पसंद केवल इसलिए पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं हो जाती कि उसकी पहली पसंद का उम्मीदवार निर्वाचित नहीं हो पाया।
बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाएँ
STV को आनुपातिक प्रतिनिधित्व के रूप में प्रभावी बनाने के लिए बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों (Multi-Member Constituencies) की आवश्यकता होगी।
वर्तमान में सामान्यतः एक लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से एक सांसद और एक विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से एक विधायक चुना जाता है। इसके स्थान पर कुछ निकटवर्ती निर्वाचन क्षेत्रों को मिलाकर बड़े निर्वाचन क्षेत्र बनाए जा सकते हैं, जहाँ से एक के बजाय कई प्रतिनिधि निर्वाचित हों।
उदाहरण के लिए यदि किसी बड़े निर्वाचन क्षेत्र से पाँच प्रतिनिधि चुने जाते हैं तो पर्याप्त जनसमर्थन रखने वाले विभिन्न राजनीतिक विचारों को प्रतिनिधित्व प्राप्त करने की संभावना बढ़ जाएगी।
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक उम्मीदवार को उसके मत प्रतिशत के ठीक समान अनुपात में स्वतः सीट मिल जाएगी। STV में अंतिम परिणाम उपलब्ध सीटों की संख्या, निर्धारित कोटा तथा मतदाताओं द्वारा दी गई दूसरी, तीसरी और आगे की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।
लेकिन इसका उद्देश्य स्पष्ट है—एक ही क्षेत्र में मौजूद विभिन्न महत्वपूर्ण राजनीतिक मतों को वर्तमान एक-सदस्यीय व्यवस्था की तुलना में अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व देना।
इससे लोकतंत्र “Winner Takes All” की प्रवृत्ति से आगे बढ़कर “हर महत्वपूर्ण जनमत को उचित प्रतिनिधित्व” देने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
मतदाता पार्टी ही नहीं, उम्मीदवार भी चुनेगा
आनुपातिक प्रतिनिधित्व की कुछ प्रणालियों में राजनीतिक दल उम्मीदवारों की सूची तैयार करते हैं और मतदाता मुख्यतः पार्टी को वोट देता है। ऐसी व्यवस्था में पार्टी नेतृत्व की शक्ति अत्यधिक बढ़ने का खतरा रहता है।
STV की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि मतदाता स्वयं उम्मीदवारों को प्राथमिकता दे सकता है।
वह किसी एक पार्टी के उम्मीदवारों के बीच भी अपनी पसंद तय कर सकता है और व्यवस्था के स्वरूप के अनुसार अलग-अलग राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों को भी अपनी क्रमवार प्राथमिकता दे सकता है।
इससे वास्तविक शक्ति केवल राजनीतिक दल के शीर्ष नेतृत्व के हाथ में केंद्रित होने के बजाय मतदाता के पास बनी रहती है।
राजनीतिक दलों को भी केवल लोकप्रिय चुनाव चिह्न या शीर्ष नेतृत्व के भरोसे चुनाव लड़ने के बजाय अच्छे, सक्षम, ईमानदार और जनता से जुड़े उम्मीदवार सामने लाने के लिए प्रेरित होना पड़ेगा।
कम होंगे निष्प्रभावी मत
वर्तमान व्यवस्था में दूसरे, तीसरे या चौथे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवारों को मिले लाखों मत सीट के रूप में प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं कर पाते।
ऊपर दिए गए उदाहरण में विजेता को 2.20 लाख मत मिले, जबकि शेष तीन उम्मीदवारों को कुल 5.30 लाख मत प्राप्त हुए। वर्तमान व्यवस्था में इन 5.30 लाख मतों की पहली पसंद किसी प्रतिनिधि को निर्वाचित नहीं करा पाई।
STV व्यवस्था में मतदाता की अगली प्राथमिकताओं के स्थानांतरण के कारण इनमें से अधिक मत प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया में प्रभावी बने रह सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक मत अनिवार्य रूप से किसी विजेता के खाते में पहुँचेगा। यदि मतदाता ने आगे की प्राथमिकता नहीं दी है या उसकी सभी प्राथमिकताएँ गणना से बाहर हो चुकी हैं, तो मत आगे स्थानांतरित नहीं हो सकता। फिर भी वर्तमान व्यवस्था की तुलना में अधिक मतों और अधिक मतदाताओं की प्राथमिकताओं को अंतिम चुनाव परिणाम में प्रभावी बनाने की संभावना रहती है।
लोकतंत्र का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं होना चाहिए कि “कौन सबसे आगे है?”, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि “समाज में मौजूद विभिन्न राजनीतिक विचारों को कितना वास्तविक प्रतिनिधित्व मिला?”
स्थानीय जवाबदेही भी बनी रहेगी
STV का एक और लाभ यह है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व के साथ क्षेत्रीय संबंध पूरी तरह समाप्त नहीं होता। बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए सभी सांसद या विधायक उसी भौगोलिक क्षेत्र के प्रतिनिधि होंगे।
आज किसी निर्वाचन क्षेत्र में सामान्यतः एक सांसद या विधायक होता है। यदि वह किसी नागरिक या क्षेत्र की समस्या पर पर्याप्त ध्यान नहीं देता, तो मतदाता के पास उसी स्तर पर दूसरा स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं होता।
बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में नागरिक उसी क्षेत्र के अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों से भी संपर्क कर सकेगा।
इससे प्रतिनिधियों के बीच जनता की समस्याएँ उठाने, क्षेत्र के विकास के लिए कार्य करने और मतदाताओं के साथ संपर्क बनाए रखने की सकारात्मक प्रतिस्पर्धा भी विकसित हो सकती है।
चुनाव सुधार का अंतिम उद्देश्य
इन सुधारों का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल को लाभ या नुकसान पहुँचाना नहीं होना चाहिए। चुनावी नियम ऐसे होने चाहिए जो सत्ता में बैठे दल और विपक्ष—दोनों पर समान रूप से लागू हों और जिनका अंतिम लाभ मतदाता तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था को मिले।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में किसी भी बड़े चुनाव सुधार को लागू करने से पहले विस्तृत संवैधानिक, प्रशासनिक और तकनीकी अध्ययन आवश्यक होगा। निर्वाचन क्षेत्रों की संरचना, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए संवैधानिक आरक्षण, मतगणना की प्रक्रिया, मतदान प्रणाली, उपचुनाव और निर्वाचित प्रतिनिधियों की स्थानीय जवाबदेही जैसे विषयों पर गंभीर विचार करना होगा।
परिवर्तन चरणबद्ध रूप से भी किया जा सकता है। विभिन्न मॉडलों का अध्ययन और परीक्षण किया जा सकता है तथा उसके बाद भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था विकसित की जा सकती है। लेकिन केवल इस कारण कि सुधार कठिन है, सुधार पर चर्चा ही न की जाए—यह लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
भारतीय लोकतंत्र को अब दो स्पष्ट सिद्धांतों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए—
पहला—दल बदलना है तो पुनः जनता के सामने जाइए।
दूसरा—मतदाता के मत को अधिकतम संभव और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व प्रदान कीजिए।
सीट न किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति है और न किसी निर्वाचित प्रतिनिधि की। सीट जनता के जनादेश की अभिव्यक्ति है।
इसी प्रकार चुनाव का उद्देश्य केवल किसी एक उम्मीदवार को विजेता घोषित करना नहीं, बल्कि जनता की विविध राजनीतिक इच्छाओं को शासन व्यवस्था में यथासंभव न्यायपूर्ण स्थान देना भी है।
“एक व्यक्ति, एक मत” ने भारतीय लोकतंत्र की नींव मजबूत की है। अब अगले बड़े चुनाव सुधार का लक्ष्य होना चाहिए—“हर मत का अधिकतम और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व।”
यदि हम ऐसी चुनाव व्यवस्था विकसित कर सकें जिसमें मतदाता की अधिकाधिक राजनीतिक पसंद प्रतिनिधित्व में परिवर्तित हो और निर्वाचित प्रतिनिधि द्वारा अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलने पर अंतिम निर्णय पुनः जनता के हाथ में जाए, तो भारतीय लोकतंत्र अधिक प्रतिनिधिक, अधिक उत्तरदायी और अधिक जन-केंद्रित बन सकता है।
अंततः लोकतंत्र में सर्वोच्च शक्ति किसी दल, नेता, सांसद या विधायक की नहीं, बल्कि जनता और उसके जनादेश की है।
लेखक – डॉ. अजय कुमार यादव
(अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। इनका उद्देश्य चुनाव सुधार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के विषय पर विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना है।)