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लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जयन्ती

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चर्चा में क्यों ?

  • लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयन्ती देश भर में 23 जुलाई को मनाई गयी।
  • लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के चिखली गाँव में हुआ था और उनका निधन 1 अगस्त 1920 को मुंबई में हुआ। उनका मूल नाम केशव गंगाधर तिलक था।
  • वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक और प्रभावशाली नेताओं में से एक थे। ब्रिटिश पत्रकार वैलेंटाइन शिरोल ने अपनी पुस्तक ‘इंडियन अनरेस्ट’ में तिलक को ‘भारतीय अशांति का जनक’ कहा था। उन्हें ‘लोकमान्य’ की उपाधि जनता द्वारा दी गई, जिसका अर्थ है – ‘जनता द्वारा स्वीकृत नेता’।
  • तिलक ने कहा था: “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”
  • यह नारा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अत्यंत प्रेरणास्पद और प्रसिद्ध हुआ।
  • वे लाल-बाल-पाल तिकड़ी (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल) के सदस्य थे, जो कांग्रेस के गरम दल का हिस्सा थे।
  • 1907 में सूरत अधिवेशन में कांग्रेस नरमपंथी और गरमपंथी दलों में विभाजित हो गई।
  • 1908 में क्रांतिकारी गतिविधियों का समर्थन करने के कारण तिलक को राजद्रोह के आरोप में 6 वर्ष की सजा सुनाई गई और उन्हें म्यांमार (तत्कालीन बर्मा) के मांडले जेल में रखा गया। वहीं पर उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘श्रीमद्भगवद्गीता रहस्य’ लिखी।
  • राजद्रोह का एक अन्य मामला 1897 में उनके केसरी पत्र में प्रकाशित “देश का दुर्भाग्य” शीर्षक लेख के कारण दर्ज हुआ था, जिसके तहत उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के अंतर्गत सजा दी गई थी।
  • शिक्षा क्षेत्र में योगदान हेतु तिलक ने 1884 में डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना की और 1885 में पुणे में फर्ग्यूसन कॉलेज की स्थापना में भूमिका निभाई।
  • 1916 में एनी बेसेंट के साथ मिलकर ‘ऑल इंडिया होम रूल लीग’ की स्थापना की, जो स्वराज की मांग को जन आंदोलन में बदलने का प्रयास था। इसी काल में उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिला और “लोकमान्य” उपाधि लोकप्रिय हुई।
  • तिलक ने जनता को संगठित करने के लिए गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव जैसे सार्वजनिक आयोजनों की शुरुआत की, जिससे राष्ट्रवाद को सामाजिक और सांस्कृतिक मंच मिला।
  • उन्होंने ‘केसरी’ (मराठी) और ‘मराठा’ (अंग्रेज़ी) नामक समाचार पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की आलोचना की और स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक आधार दिया।
  • उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं:
  • गीता रहस्य (मांडले जेल में लिखी गई)
  • The Arctic Home in the Vedas (1903)
  • The Orion
  • The Hindu Philosophy of Life, Ethics and Religion (1887)
  • 1919 में अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के बाद, उन्होंने मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों के माध्यम से विधायी परिषदों में भारतीय भागीदारी को एक अवसर के रूप में देखा, जबकि गांधी जी का बहिष्कार का रुख था।
  • उनकी मृत्यु के बाद महात्मा गांधी ने उन्हें ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ कहा और नेहरू ने उन्हें ‘भारतीय क्रांति का जनक’ बताया।
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