
- भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक निर्णय लेते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का नाम बदलकर Seva Teerth” कर दिया है।
- यह कदम केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि शासन की मूल भावना को “सत्ता से सेवा” की ओर मोड़ने का प्रयास माना जा रहा है।
क्यों बदला गया नाम? — उद्देश्य और संदेश
- सरकार के अनुसार यह बदलाव प्रशासनिक सोच में एक सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत है।
- नया नाम “सेवा तीर्थ” इस विचार को मजबूत करता है कि पीएमओ केवल शक्ति का केंद्र नहीं, बल्कि जनसेवा का सर्वोच्च स्थल है।
- सरकार का कहना है कि यह कदम पुराने “औपनिवेशिक प्रभाव” से दूरी बनाता है और संस्थाओं को लोक कल्याण, सेवा व जनहित की दिशा में पुनर्परिभाषित करता है।
नई व्यवस्था — क्या बदलने वाला है?
- प्रधानमंत्री कार्यालय को एक नए आधुनिक परिसर में स्थानांतरित किया जाएगा, जिसे “Seva Teerth-1” नाम दिया गया है।
- इस परिसर में उन्नत प्रशासनिक सुविधाएँ और सुधारात्मक ढांचा शामिल होगा।
- इसी प्रक्रिया के तहत अन्य महत्वपूर्ण सरकारी आवासों और दफ्तरों के नाम भी बदले जा रहे हैं —
- जैसे राज्यपालों के “राज भवन” का नाम बदलकर “Lok Bhavan” किया जाना।
पृष्ठभूमि — नाम बदलने की परंपरा जारी
यह कदम किसी एकल निर्णय का हिस्सा नहीं, बल्कि पिछले वर्षों की नाम-परिवर्तन श्रृंखला का विस्तार है:
- राजपथ का नाम बदलकर Kartavya Path किया गया।
- प्रधानमंत्री के आधिकारिक निवास का नाम बदलकर Lok Kalyan Marg किया गया।
- अब उसी क्रम में पीएमओ और अन्य प्रशासनिक भवनों को नया स्वरूप दिया जा रहा है ताकि सार्वजनिक संस्थान राजसी शक्ति के बजाय सेवा और कर्तव्य का संदेश दें।
चर्चा के महत्वपूर्ण प्रश्न — पाठकों के लिए
- क्या यह बदलाव केवल नामों तक सीमित रहेगा या प्रशासन की कार्यशैली में भी वास्तविक सुधार दिखेगा?
- “सत्ता से सेवा” का संदेश कितना प्रभावी होगा, और क्या इससे जनता की धारणा में सकारात्मक बदलाव आएगा?
- ऐसे बदलाव संस्थाओं में जनता का विश्वास बढ़ाएंगे या यह केवल प्रतीकात्मक पहल बनकर रह जाएगी?
