
- प्रसिद्ध वरिष्ठ कवि और कथाकार विनोद कुमार शुक्ल का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया है।रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने उनके निधन की आधिकारिक पुष्टि की है।
- विनोद कुमार शुक्ल पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ थे और अस्पताल में भर्ती थे।वे अपनी जादुई और संवेदनशील लेखन शैली के लिए हिंदी साहित्य में विशेष रूप से जाने जाते थे।
- ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह’ और ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ जैसी रचनाओं ने उन्हें अमर पहचान दिलाई।
- हाल ही में उन्हें हिंदी साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार 2024’ के लिए चुना गया था।ज्ञानपीठ पुरस्कार की घोषणा के कुछ ही सप्ताह बाद उनके निधन से साहित्य जगत स्तब्ध और शोकाकुल है।
- अपने चयन पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें बहुत लिखना था, लेकिन वे बहुत कम लिख पाए।
- उनकी यह विनम्रता और आत्मस्वीकृति उनके व्यक्तित्व की गहराई को दर्शाती है।1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल ने साधारण जीवन को असाधारण साहित्यिक रूप दिया।
- उनके लेखन का केंद्र मध्यमवर्गीय जीवन, साधारण वस्तुएँ और उपेक्षित मानवीय अनुभव रहे।
- आलोचकों के अनुसार उन्होंने राजनीतिक बयानबाज़ी से दूर रहते हुए भी आम और पीड़ित मनुष्य के पक्ष में सशक्त साहित्य रचा।
- उनका पहला कविता संग्रह ‘लगभग जय हिन्द’ वर्ष 1971 में प्रकाशित हुआ था।
- कविता के क्षेत्र में उन्होंने भाषा, शिल्प और संवेदना को एक नया आयाम दिया।
- वर्ष 1979 में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ हिंदी उपन्यास साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है।
- ‘नौकर की कमीज़’ पर प्रसिद्ध फिल्मकार मणि कौल ने एक चर्चित फिल्म का निर्माण भी किया था।
- ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ तथा ‘पेड़ पर कमरा’ जैसी रचनाएँ भी अत्यंत लोकप्रिय रहीं।
- विनोद कुमार शुक्ल का साहित्य भारतीय जीवन की सूक्ष्म भावनाओं और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त दस्तावेज़ है।
- उनके निधन से हिंदी साहित्य ने एक मौन, लेकिन अत्यंत प्रभावशाली स्वर खो दिया है।
