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पद्मावती (Padmavati) : एक भूली-बिसरी नगरी की कहानी

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1. परिचय: इतिहास के पन्नों में खोया एक शहर

1.1. प्रस्तावना

इतिहास की गहराइयों में कुछ शहर ऐसे हैं जो कभी शक्ति और संस्कृति के केंद्र थे, लेकिन आज गुमनामी के परदे में छिपे हैं। पद्मावती (Padmavati) एक ऐसी ही रहस्यमयी नगरी है। तीसरी और चौथी शताब्दी में यह शक्तिशाली नाग साम्राज्य की भव्य राजधानी हुआ करती थी, जहाँ ऊँचे महल और मंदिर शान से खड़े थे। आज, उसी स्थान पर पवाया (pawaya) नाम का एक छोटा सा, जीर्ण-शीर्ण गाँव बसा है, जो अपने नीचे एक शानदार अतीत को समेटे हुए है।

1.2. साहित्यिक धरोहर

पद्मावती का अस्तित्व केवल पुरातात्विक खोजों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राचीन भारतीय साहित्य में भी जीवित है। इसके शुरुआती सुराग हमें कई महत्वपूर्ण ग्रंथों से मिलते हैं:

  • पुराण: विष्णु पुराण स्पष्ट रूप से उल्लेख करता है कि नाग वंश के राजाओं ने पद्मावती, कांतिपुरी और मथुरा में शासन किया। यह हमें इस शहर के राजनीतिक महत्व का पहला ठोस साहित्यिक प्रमाण देता है।
  • हर्षचरित: सातवीं शताब्दी में बाणभट्ट द्वारा रचित इस ग्रंथ में भी पद्मावती का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि नागों के पतन के सदियों बाद भी यह शहर लोगों की स्मृति में जीवित था।
  • मालती-माधव: प्रसिद्ध नाटककार भवभूति का यह नाटक पूरी तरह से पद्मावती शहर में ही रचा गया है। यह नाटक न केवल शहर के जीवन का एक जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है, बल्कि इसमें दिए गए भौगोलिक विवरणों ने ही इतिहासकारों को इसके वास्तविक स्थान तक पहुँचाया।

साहित्य में बिखरे इन सूत्रों ने इतिहासकारों को एक दिशा दी, और पुरातात्विक साक्ष्यों ने अंततः पद्मावती के खोए हुए शहर के स्थान की पुष्टि कर दी।

2. पद्मावती का पता: नदियों और कहानियों के संगम पर

2.1. भौगोलिक पहेली

पद्मावती की सटीक खोज एक रोमांचक जासूसी की तरह थी, जिसके सुराग भवभूति के नाटक मालती-माधव में छिपे थे। नाटक में वर्णन है कि यह शहर सिंधु और पारा नामक दो नदियों के संगम पर स्थित था और उनसे घिरा हुआ था। इसके अलावा, पास में लवणा नदी बहती थी। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सुराग यह था कि शहर से कुछ ही दूरी पर सिंधु और मधुमती नदियों के संगम पर सुवर्णबिंदु नामक शिव का एक मंदिर था। जब इतिहासकारों ने इन सभी संकेतों का मिलान आधुनिक भूगोल से किया, तो वे सीधे मध्य भारत के एक खास स्थान पर पहुँचे।

आज की सिंध, पार्वती, नून और महुवर नदियाँ ही प्राचीन सिंधु, पारा, लवणा और मधुमती हैं। इन सभी भौगोलिक विशेषताओं का सटीक मिलन जिस स्थान पर हुआ, वह आज का पाया गाँव है। नदियों के संगम पर स्थित होने के कारण पद्मावती न केवल सुरक्षित थी, बल्कि व्यापार और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी बनी।

2.2. आज का पवाया

आधुनिक गाँव पवाया और प्राचीन पद्मावती के बीच का संबंध केवल भौगोलिक नहीं है। गाँव का एक पुराना और लंबा नाम ‘पदम-पावाया’ है, जो स्पष्ट रूप से प्राचीन नाम ‘पद्मावती’ की स्मृति को आज भी जीवित रखे हुए है। इस प्रकार, एक छोटा सा गाँव अपने नाम में एक महान साम्राज्य की राजधानी की विरासत को सँजोए हुए है।

शहर के स्थान की पुष्टि हो जाने के बाद, इतिहासकारों ने उस शक्तिशाली राजवंश की कहानी को उजागर किया जिसने इस शहर को अपनी राजधानी बनाया।

3. नागों का स्वर्ण युग (तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी)

3.1. नाग वंश का उदय

दूसरी शताब्दी ईस्वी के अंत में जब विशाल कुषाण साम्राज्य का पतन होने लगा, तो भारत के राजनीतिक पटल पर नागों का उदय हुआ। उन्होंने अपनी स्वतंत्रता पुनः प्राप्त की और पद्मावती को अपनी राजधानी बनाकर एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की। तीसरी और चौथी शताब्दी के दौरान, उनका प्रभाव उत्तर में मथुरा से लेकर दक्षिण में विदिशा (आधुनिक भिलसा) तक फैला हुआ था, जिससे वे मध्य भारत की एक प्रमुख शक्ति बन गए।

3.2. शक्ति और पतन

नाग राजाओं की शक्ति और प्रतिष्ठा को दो प्रमुख तथ्यों से समझा जा सकता है:

  1. दस अश्वमेध यज्ञ: नाग राजाओं के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञ किए थे। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान था, जिसे केवल सार्वभौम और निर्विवाद संप्रभु शासक ही कर सकते थे। यह उनकी सैन्य शक्ति और राजनीतिक प्रभुत्व का सबसे बड़ा प्रतीक था।
  2. राजनयिक संबंध: नाग केवल सैन्य रूप से ही शक्तिशाली नहीं थे, बल्कि कूटनीति में भी निपुण थे। नाग राजा भव नाग (लगभग 305-340 ईस्वी) ने अपनी बेटी का विवाह उस समय के एक और शक्तिशाली राजवंश, वाकाटकों से किया था। यह वैवाहिक गठबंधन उनके व्यापक राजनीतिक प्रभाव को दर्शाता है।

3.3. साम्राज्य का अंत

नागों का शासन लगभग चौथी शताब्दी के मध्य में समाप्त हो गया, जब गुप्त साम्राज्य के महान सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने विजय अभियान के दौरान अंतिम नाग राजा गणपति नाग को पराजित किया। इस हार के साथ, पद्मावती में नाग वंश का शासन समाप्त हो गया और यह गौरवशाली शहर विशाल गुप्त साम्राज्य का हिस्सा बन गया।

साहित्य के धुंधले संकेतों ने हमें शहर का पता तो दे दिया, पर इसकी असली भव्यता तो ईंट और पत्थर के नीचे दबी थी, जिसे पुरातत्वविदों ने परत-दर-परत उजागर किया।

4. प्राचीन पद्मावती की एक झलक: इमारतें और खंडहर

4.1. खोदा गया मंदिर

पाया गाँव के पास एक विशाल टीले की खुदाई से एक भव्य हिंदू मंदिर के अवशेष सामने आए। हालाँकि समय ने मंदिर के ऊपरी हिस्से को नष्ट कर दिया, लेकिन इसका विशाल आधार आज भी नागों की स्थापत्य कला की गवाही देता है।

  • तीन चबूतरे: यह मंदिर ईंटों से बने तीन विशाल और ठोस चबूतरों पर बनाया गया था, जो एक के ऊपर एक स्थित थे। सबसे ऊपरी चबूतरा संभवतः मुख्य गर्भगृह था।
  • निर्माण के दो चरण: अध्ययन से पता चलता है कि मंदिर का निर्माण दो अलग-अलग चरणों में हुआ था। पहले एक अलंकृत मंदिर बनाया गया, और बाद की अवधि में उसे एक बड़े और सादे चबूतरे से घेर कर विस्तारित किया गया। यह एक पुरातात्विक पहेली है, क्योंकि यह कहना मुश्किल है कि एक सुंदर ढंग से निर्मित मंदिर को बाद में सादे चिनाई के एक विशाल आवरण के भीतर क्यों बंद कर दिया गया।
  • धार्मिक महत्व: शुरुआत में इसे एक बौद्ध स्तूप माना गया, लेकिन खुदाई में मिली सभी मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ या तो ब्राह्मणवादी (हिंदू) थीं या धर्मनिरपेक्ष विषयों पर आधारित थीं। इससे यह सिद्ध होता है कि यह एक विशाल हिंदू मंदिर था।

4.2. शहर के अन्य महत्वपूर्ण स्थल

पद्मावती का स्थल इतिहास की कई परतों का एक जीवंत संग्रहालय है, जहाँ हर युग ने अपनी छाप छोड़ी है। नागों के मंदिर के अलावा, यहाँ बाद के समय के किले, मकबरे और मंदिर भी मौजूद हैं, जो शहर की बदलती कहानी को दर्शाते हैं।

स्थलमहत्व
किला (1512 ई.)सिकंदर लोदी के गवर्नर सफदर खान द्वारा निर्मित यह किला बाद के इस्लामी शासन को दर्शाता है। इसे बनाने के लिए प्राचीन खंडहरों की ईंटों का उपयोग किया गया था।
मस्जिदें और मकबरेकिले के आसपास कई मकबरों और मस्जिदों के खंडहर बिखरे हुए हैं, जो 16वीं शताब्दी और उसके बाद के मुस्लिम शासन के प्रमाण हैं।
धूमेश्वर महादेव मंदिरसिंध नदी के किनारे स्थित यह मंदिर ओरछा के बुंदेला शासक वीरसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था, जो इस क्षेत्र में बुंदेला प्रभाव को दिखाता है।
पावाया का स्थानीय नामस्थानीय लोग इसे ‘पोल पाया’ (खोखला पाया) कहते हैं। इसके पीछे एक किंवदंती है कि एक देवी के प्रकोप से यह शहर उलट-पुलट हो गया था, जिससे यह खोखला हो गया।

शहर की भव्य संरचनाओं के साथ-साथ, यहाँ से मिली कलाकृतियाँ हमें पद्मावती के लोगों की कला और जीवन के और भी करीब ले जाती हैं।

5. पद्मावती के खजाने: मूर्तियाँ, मिट्टी के खिलौने और सिक्के

5.1. पत्थर की बोलती मूर्तियाँ

पद्मावती की खुदाई से प्राप्त पत्थर की मूर्तियाँ उस युग की कलात्मक उत्कृष्टता और सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रमाण हैं। इनमें से तीन सबसे महत्वपूर्ण हैं:

  1. यक्ष मणिभद्र की मूर्ति: यह आदमकद मूर्ति शहर के शुरुआती इतिहास का सबसे ठोस प्रमाण है। इसके आसन पर ब्राह्मी लिपि में एक अभिलेख खुदा है, जो इसे राजा शिवनंदी के शासनकाल के चौथे वर्ष (लगभग पहली शताब्दी ईस्वी) का बताता है। यह अभिलेख न केवल नागों से पहले के एक शासक का नाम उजागर करता है, बल्कि उस समय प्रचलित यक्ष पूजा पर भी प्रकाश डालता है।
  2. नाग राजा की मूर्ति: यह एक सुंदर और तराशी हुई आदमकद मूर्ति है, जिसके सिर पर सात फनों वाले नाग की छतरी थी। माना जाता है कि यह मूर्ति संभवतः मंदिर का निर्माण कराने वाले किसी नाग राजा का ही प्रतिनिधित्व करती है, जो अपने गौरव और शक्ति का प्रतीक है।
  3. विशाल प्रवेश द्वार का लिंटेल (चौखट): मंदिर के प्रवेश द्वार का यह विशाल पत्थर का टुकड़ा कला का एक उत्कृष्ट नमूना है। इस पर केवल सामान्य दृश्य नहीं, बल्कि हिंदू पौराणिक कथाओं के जटिल आख्यान उकेरे गए हैं। एक तरफ राजा बलि का यज्ञ है, तो दूसरी तरफ विष्णु अपने विराट रूप में तीन पग लेते हुए दिखाए गए हैं। एक अन्य पैनल में हिरणों द्वारा खींचे जा रहे रथ पर चंद्र देव विराजमान हैं, और भगवान कार्तिकेय को भी दर्शाया गया है। यह उस समय के कारीगरों के अद्भुत पौराणिक ज्ञान और कलात्मक कौशल को दर्शाता है।

5.2. मिट्टी की कला: टेराकोटा

पद्मावती की खुदाई में पत्थर की मूर्तियों के अलावा बड़ी संख्या में टेराकोटा (पकी हुई मिट्टी) की वस्तुएँ भी मिली हैं। ये वस्तुएँ हमें पद्मावती के आम लोगों के जीवन की एक अनमोल झलक देती हैं। इनमें मुस्कुराते और रोते हुए चेहरे, विभिन्न प्रकार के केशविन्यास वाली महिलाओं के सिर, सुंदर पोशाकों में सजे धड़, और हाथी, घोड़े और बंदर जैसे जानवरों की आकृतियाँ शामिल हैं। ये कलाकृतियाँ उस युग के सौंदर्य बोध, भावनाओं और कलात्मक अभिव्यक्ति को दर्शाती हैं।

5.3. शासकों के सिक्के

पद्मावती के खंडहरों से हजारों की संख्या में नाग राजाओं के सिक्के मिले हैं। ये छोटे तांबे के सिक्के नाग वंश के इतिहास को लिखने में सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन सिक्कों पर राजा का नाम और कुछ प्रतीक अंकित होते थे।

राजा का नामप्रतीकउपाधि (यदि उल्लिखित हो)
भवबैल, त्रिशूलमहाराजा श्री / अधिराज श्री
भीममोर
गणपतिबैल, चक्रमहाराजा श्री गणेन्द्र
वृषसामने से बैल
स्कंदबैल, मोर
देवबैल, मोर
विभुबैल और अंकुश
व्याघ्रबैल, सिंह

इन सिक्कों ने हमें कम से कम तेरह नाग राजाओं के नाम दिए हैं। जब हम इस जानकारी को हर्षचरित में वर्णित नागसेन और इलाहाबाद स्तंभ लेख में उल्लिखित नागदत्त जैसे अन्य साहित्यिक स्रोतों से जोड़ते हैं, तो हमें कुल मिलाकर लगभग 15 नाग शासकों के बारे में पता चलता है। इस प्रकार, ये छोटे सिक्के एक पूरे राजवंश को इतिहास की गुमनामी से बाहर ले आते हैं।

6. वैभव से खंडहर तक का सफर

गुप्तों द्वारा विजय के बाद पद्मावती का पतन अचानक नहीं हुआ। आठवीं शताब्दी में भवभूति के नाटक से पता चलता है कि यह शहर तब भी एक राजधानी और एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र बना रहा, जहाँ एक विश्वविद्यालय भी था जो दूर-दराज के छात्रों को आकर्षित करता था।

लेकिन समय के साथ इसका पुराना गौरव फीका पड़ने लगा। बाद के शासकों ने अपनी इमारतें—जैसे किले, मकबरे और मस्जिदें—बनाने के लिए प्राचीन मंदिरों और महलों के खंडहरों से ईंटें और पत्थर निकालना शुरू कर दिया। सदियों तक चली इस प्रक्रिया ने एक शानदार शहर को धीरे-धीरे एक टीले और खंडहर में बदल दिया, जहाँ आज केवल उसकी परछाई ही बाकी है।

7. निष्कर्ष: पद्मावती की विरासत

पद्मावती की कहानी केवल एक शक्तिशाली नाग राजधानी के उत्थान और पतन की कहानी नहीं है। यह कला, संस्कृति और धर्म के एक जीवंत केंद्र की गाथा है, जिसने सदियों तक मध्य भारत के इतिहास को आकार दिया। यहाँ की मूर्तिकला में उकेरी गई पौराणिक कथाएँ, टेराकोटा में कैद आम लोगों की भावनाएँ और छोटे-से तांबे के सिक्के पर लिखा एक राजा का नाम—ये सब मिलकर इतिहास को फिर से जीवित करते हैं। पद्मावती हमें याद दिलाती है कि पुरातत्व केवल खंडहरों को खोदना नहीं है, बल्कि यह भारत के गौरवशाली अतीत के भूले हुए अध्यायों को फिर से खोजना और उन्हें भविष्य के लिए जीवित करना है, ताकि एक पूरी सभ्यता को गुमनामी से बचाया जा सके।

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