- केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में राज्य केरल का नाम “केरल (Kerala)” से बदलकर “केरलम (Keralam)” करने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की है। यह निर्णय संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया है।
निर्णय की संवैधानिक प्रक्रिया
केरल विधान सभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर राज्य का नाम “केरल” से “केरलम” करने की माँग की थी। प्रस्ताव के प्रमुख तर्क निम्न थे—
- मलयालम भाषा में राज्य का नाम “केरलम” है।
- 1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ था।
- 1 नवंबर को ही केरल पिरवी दिवस मनाया जाता है।
- स्वतंत्रता आंदोलन के समय से मलयालम भाषी क्षेत्रों को एकीकृत करने की माँग रही है।
- संविधान की प्रथम अनुसूची में राज्य का नाम “केरल” दर्ज है, जिसे “केरलम” किया जाना चाहिए।
इस प्रस्ताव के आधार पर केरल सरकार ने भारत सरकार से संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन की औपचारिक माँग की।
अनुच्छेद 3 (Article 3) का महत्व
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को यह अधिकार देता है कि वह—
- किसी राज्य का नाम परिवर्तित कर सकती है,
- लेकिन ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता,
- तथा संबंधित राज्य की विधान सभा से उसकी राय लेना अनिवार्य है।
गृह मंत्रालय की भूमिका
- यह मामला गृह मंत्रालय में विचाराधीन रहा। गृह मंत्री अमित शाह की स्वीकृति के बाद मंत्रिमंडल के लिए मसौदा नोट तैयार किया गया।
- इसके बाद विधि एवं न्याय मंत्रालय के विधिक कार्य विभाग और विधायी विभाग से परामर्श लिया गया, जिन्होंने राज्य का नाम “केरल” से “केरलम” करने के प्रस्ताव से सहमति व्यक्त की।
