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सर क्रीक विवाद

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ख़बरों में क्यों?

  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में सर क्रीक क्षेत्र में पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियों पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने चेतावनी दी कि किसी भी तरह की हिमाकत का जवाब ऐसा दिया जाएगा कि इतिहास और भूगोल दोनों बदल सकते हैं। शस्त्र पूजन के अवसर पर आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वह जानबूझकर इस विवाद को बढ़ावा दे रहा है, जबकि भारत बार-बार इसे संवाद के माध्यम से सुलझाने का प्रयास कर चुका है। उन्होंने बताया कि सर क्रीक के पास पाकिस्तान द्वारा हाल ही में सैन्य ढाँचे का विस्तार उसके अस्पष्ट इरादों और भड़काऊ रुख को दर्शाता है।

सर क्रीक क्या है?

  • सर क्रीक 96 किलोमीटर लंबी जल-धारा है, जो गुजरात के कच्छ क्षेत्र के रण में स्थित है। यह भारत के कच्छ और पाकिस्तान के सिंध प्रांत के बीच प्राकृतिक सीमा का निर्माण करती है और आगे जाकर अरब सागर में मिलती है। ऐतिहासिक रूप से इसे “बाण गंगा” कहा जाता था। औपनिवेशिक काल में इसे एक ब्रिटिश अधिकारी के नाम पर “सर क्रीक” कहा जाने लगा।

विवाद की उत्पत्ति

  • सर क्रीक विवाद 1908 में उत्पन्न हुआ, जब कच्छ के शासक और सिंध सरकार के बीच क्रीक क्षेत्र में लकड़ी संग्रह को लेकर मतभेद हुए। इसे सुलझाने के लिए 1914 का बॉम्बे गवर्नमेंट रेज़ोल्यूशन जारी किया गया। इसमें विरोधाभासी प्रावधान थे। पैरा 9 में कहा गया कि सीमा क्रीक के पूर्व में होगी, जिसका अर्थ है कि पूरा क्रीक पाकिस्तान का होगा। वहीं, पैरा 10 में थालवेग सिद्धांत लागू किया गया, जिसमें कहा गया कि क्रीक अधिकांश समय नौगम्य है, इसलिए मध्य धारा को प्रभावी सीमा माना जाना चाहिए। इसी विरोधाभास ने विवाद को जन्म दिया और अब तक यह अनसुलझा है।
  • सर क्रीक का महत्व – सर क्रीक का सामरिक, आर्थिक और पारिस्थितिक महत्व है।
  • सामरिक महत्व – सर क्रीक रण कच्छ के पास स्थित है, जहाँ 1965 के युद्ध में भारत और पाकिस्तान का संघर्ष हुआ था। इस क्षेत्र पर नियंत्रण समुद्री सुरक्षा और निगरानी के लिए महत्वपूर्ण है।

पारिस्थितिक महत्व

  • सर क्रीक पारिस्थितिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र है। यहाँ फ्लेमिंगो और अन्य प्रवासी पक्षी सर्दियों में आते हैं। जैव विविधता के संरक्षण के लिए यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है।

आर्थिक महत्व

सर क्रीक एशिया के सबसे बड़े मत्स्य-क्षेत्रों में से एक है और हजारों मछुआरों की आजीविका का आधार है। इसके अलावा, समुद्र तल के नीचे तेल और गैस भंडार होने की संभावना है, लेकिन विवाद के कारण इन संसाधनों का पता लगाने का काम रुका हुआ है।

आगे का रास्ता

  • सर क्रीक विवाद का समाधान कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के मछुआरे गलती से सीमा पार करने पर अक्सर गिरफ्तार हो जाते हैं, जिससे तनाव बढ़ता है और उनकी आजीविका प्रभावित होती है। विवाद का समाधान होने पर तेल और गैस के भंडार का पता लगाने की सुविधा होगी और समुद्री सीमाओं पर बेहतर नियंत्रण स्थापित होगा। भारत-पाकिस्तान के कई विवादों में सर क्रीक अपेक्षाकृत सरल और कम राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है, इसलिए यह प्रारंभिक समाधान के लिए उपयुक्त माना जा सकता है।

समाधान के प्रयास

  • सर क्रीक विवाद को सुलझाने के कई प्रयास किए गए हैं। 1965 के युद्ध के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैरॉल्ड विल्सन के हस्तक्षेप से एक ट्रिब्यूनल बना, जिसने 1968 में पाकिस्तान को केवल अपने दावे का 10% हिस्सा दिया। 1997 में समग्र संवाद (Composite Dialogue) के दौरान सर क्रीक पर चर्चा हुई। 1999 में भारतीय वायुसेना ने सर क्रीक के ऊपर एक पाकिस्तानी टोही विमान गिराया, जिससे तनाव बढ़ा। 2005 से 2007 के बीच दोनों देशों ने क्षेत्र का संयुक्त सर्वेक्षण किया। इन सभी प्रयासों के बावजूद, ऐतिहासिक मानचित्रों और कानूनी सिद्धांतों की अलग व्याख्याओं के कारण अंतिम समझौता नहीं हो सका।

सर क्रीक विवाद का स्वरूप

  • सर क्रीक विवाद का मूल कारण भारत और पाकिस्तान द्वारा समुद्री सीमा की अलग-अलग व्याख्या है। विभाजन से पहले यह क्षेत्र बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। 1947 के विभाजन के बाद कच्छ भारत में और सिंध पाकिस्तान में चला गया।
  • पाकिस्तान का दावा है कि 1914 में बॉम्बे सरकार के प्रस्ताव के अनुसार, क्रीक की पूर्वी धारा सीमा बनती है, जिसका मतलब है कि पूरा सर क्रीक पाकिस्तान का है। भारत 1925 के मानचित्र और 1924 में बनाए गए मध्य-धारा स्तंभों का हवाला देते हुए कहता है कि सीमा क्रीक की मध्य धारा (mid-channel) से गुजरती है। भारत अंतरराष्ट्रीय कानून के थालवेग सिद्धांत का उल्लेख करता है, जिसके अनुसार जलमार्ग में सीमा मुख्य नौगम्य धारा के मध्य से गुजरती है। पाकिस्तान इस तर्क को अस्वीकार करता है और कहता है कि सर क्रीक नौगम्य नहीं है, जबकि भारत का मानना है कि ऊँची ज्वार (high tide) में यहाँ नौकायन संभव है और मछुआरे इसका उपयोग अरब सागर तक पहुँचने के लिए करते हैं।

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