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झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का निधन (1944 – 2025)

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  • शिबू सोरेन का 81 वर्ष की उम्र में 4 अगस्त 2025 को दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया।
  • उनका जन्म तत्कालीन बिहार के रामगढ़ जिले (अब झारखंड के साहेबगंज ज़िला) के नेमरा गाँव में एक साधारण संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था।
  • इनके पिता सोबरन सोरेन एक साधारण किसान थे।
  • शिबू सोरेन ने महाजनी प्रथा और शराबबंदी के खिलाफ आंदोलन से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की।
  • याद थे जब शिबू मात्र 13 वर्ष के थे, तब उनके पिता की हत्या महाजनी उत्पीड़न के विरोध के कारण कर दी गई। यह घटना उनके जीवन की दिशा को पूरी तरह बदलने वाली साबित हुई। बालमन में अन्याय और शोषण के खिलाफ जो आक्रोश उपजा, वही उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता और बाद में झारखंड आंदोलन के पुरोधा के रूप में पहचान दिलाने वाला बना।
  • 4 फरवरी 1973 को उन्होंने विनोद बिहारी महतो और ए.के. रॉय के साथ मिलकर ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (JMM) की स्थापना की। इस संगठन का मूल उद्देश्य बिहार से अलग झारखंड राज्य की माँग को लेकर संघर्ष करना था। इस आंदोलन के दौरान वे जनसभा, पदयात्रा और आदिवासी एकता के प्रतीक बनते चले गए।
  • साल 1980 में वे पहली बार दुमका लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद उन्होंने कुल 8 बार इस सीट पर जीत हासिल की और लोकसभा में झारखंड और आदिवासी समाज की मजबूत आवाज़ बने। इसके अतिरिक्त उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता भी निभाई। राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पहचान उस समय और अधिक मजबूत हुई जब वे 2004 में केंद्र सरकार में कोयला मंत्री नियुक्त किए गए। उन्होंने तीन बार इस मंत्रालय को संभाला।
  • उनके राजनीतिक जीवन में विवाद भी शामिल रहे। वर्ष 1975 के चिरुदीह हत्याकांड और वर्ष 1994 के शशिनाथ झा हत्याकांड ने उनकी छवि को झटका दिया। 2006 में उन्हें शशिनाथ झा की हत्या के आरोप में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई, जिसके बाद उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि बाद में उन्हें इस मामले में कानूनी राहत मिली।
  • शिबू सोरेन का जीवन एक आदिवासी बालक से लेकर एक आंदोलनकारी, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री बनने तक की प्रेरणादायी गाथा है। वे झारखंड की आत्मा, संघर्ष और पहचान के प्रतीक बने रहेंगे। उनके द्वारा छेड़े गए आंदोलन ने न केवल एक राज्य का निर्माण किया, बल्कि करोड़ों आदिवासियों को आवाज़ दी। वे आज भी झारखंड के इतिहास में ‘दिशोम गुरु’ के रूप में अमर रहेंगे।

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